ऐसे करें सेब की सही किस्म का चुनाव

अवनीश चौहान, सदस्य यंग एंड यूनाइटेड ग्रोवर्स एसोसिएशन (युगा)।

 

दुनिया भर में सेब की 8300 से अधिक किस्में पाई गई है। सेब उत्पादन में अग्रणी देश भी अपनी जलवायु, बाज़ार की मांग, उपभोक्ताओं के स्वादानुसार साल दर साल सेब की नवीनतम किस्में इज़ाद करने में जुटे हैं। इसी के परिणामस्वरूप एक ही प्रजाति के सेब की कई किस्में विकसित कर ली गई है। पश्चिमी देशों की बात करें तो वहां अब गाला व ग्रेनी स्मिथ जैसे सेब की अधिक मांग है। इसी वजह से इन देशों में हर साल गाला प्रजातीय सेब की नयी किस्में विकसित की जा रही है। जिनमे लाल रंग और स्वाद की गुणवत्ता को सुधारने का प्रयास किया जा रहा है।

वहीं, अगर एशियाई देशों की बात की जाए तो यहां के उपभोक्ताओं का स्वाद कुछ अलग है। यहां के लोग अधिकतर मीठा फल खाना पसंद करते हैं, इसलिए यहां पर सेब की डिलीशियस किस्मों की पैदावार पर अधिक बल दिया जाता है।

हालांकि चीन ने फुजी किस्म के सेब का उत्पादन कर इस बाज़ार में अपनी अलग पहचान बनाई है। साथ ही, ऑस्ट्रेलिया और नयूजीलैंड की बात की जाए तो वहां का फल उत्पादक और फल अनुसंधान मेरी नज़र में सबसे कुशाग्र है। इसकी वजह यह है कि उनके पास अपर्याप्त उपभोक्ता होने के कारण उन्हें अधिकार फल एशियाई बाज़ार में निर्यात करने होते है। इस चुनौती से निपटने का उन्होंने सरल तरीका ढूंढ लिया है। उन्होंने सेब व नाशपाती की एशियाई और यूरोपीय किस्मों को क्रॉस ब्रीड करके इन फलों की नई किस्में तैयार की है। जो स्वाद में एशियाई किस्मों की तरह मीठी और यूरोपीय किस्मों की तरह भंडारण क्षमता से भरपूर है।

वैश्वीकरण के दौर में इन किस्मों को पाना एक बागवान के लिए अधिक चुनौती भरा काम नहीं है। लेकिन असल बात यह है कि इन सैकड़ों किस्मों में से अपने बागीचे के लिए सबसे बेहतर विकल्प की तलाश करना ऐसा है जैसे किसी खेत में सुई तलाशना। फिर भी कुछ बिंदुओं को ध्यान में रखकर हिमाचल के बागवान अपने बागीचे के लिए सेब की सही किस्म का चुनाव कर सकते है।

सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि सेब की किस्में 3 तरह की होती है। स्पर, सेमी स्पर और स्टैंडर्ड। स्पर किस्में बौनी प्रवृति की होती है जिनकी ग्रोथ कम और बीमा बनाने की क्षमता अधिक होती है। इन किस्मों में स्कारलेट सीरीज, रेड कैप, रेड कान, कैम स्पर, सुपर चीफ़ इत्यादि शामिल हैं।

सेमी स्पर किस्में वह किस्में होती है जिनमे बीमा बनाने के साथ साथ स्पर किस्मों के मुकाबले ग्रोथ रेट ज्यादा बेहतर होता है। इनका आकार स्पर किस्मों के मुकाबले बडा होता है। इनमे एडम्स, ऐस स्पर, किंग रॉट, रेड विलॉक्स, ओरेगन स्पर 2, जेरॉमाइन वगैरह शामिल है।

स्टैंडर्ड किस्में वह होती है जिनकी ग्रोथ अत्यधिक होती है। इनमे बीमा कम बनता है और यह किस्में उत्पादन भी देरी से शुरू करती है। इनमे रॉयल, वांस, हैपका, ग्रेनी स्मिथ, फूजी, गाला, गोल्डन जैसी किस्मों को शामिल किया जाता है।

किसी भी किस्म के चयन से पहले बागवान अपने बागीचे की ऊंचाई जान ले। आमतौर पर देखा गया है कि कम ऊंचाई वाली जगहों पर सेब के पौधों में ग्रोथ तो ठीक ठाक होती है किन्तु फलों में ठीक ढंग से रंग नहीं आता। जिसके कारण मार्केट में ऐसे फलों की अधिक मांग नहीं रहती। ऐसी जगहों के लिए बागवानों को अधिक रंगत वाली किस्मों एडम्स, जैरोमाइन, रेड विलॉक्स, स्कारलेट स्पर २ का चुनाव करना चाहिए। अगर ऐसी जगहों पर सिंचाई व्यवस्था हो और बागवान जल्दी तैयार होने वाली किस्मों पर काम करना चाहते है तो वह गाला प्रजाति के डार्क बैरोन, गलावल, जुगाला, रेडलम गाला जैसी किस्मों को आज़मा सकते हैं।

मीडियम बेल्ट के सेब बागवानों को अधिक रंगत वाली किस्मों के चुनाव से बचना चाहिए। यहां इन किस्मों में फल के आकार में कमी पाई गई है। यहां पर हाल ही में इटली से आयातित किंग रॉट और सुपर चीफ़, रेड कान, रेड कैप वल्टोड जैसी किस्मों को आजमाया जा सकता है। हालांकि सुपर चीफ़ व रेड कान बौनी प्रवृति की किस्में है जिसका पौधा आकार में छोटा रह जाता है। लेकिन इन्हें बड़े रुटस्टॉक्स या सीडलिंग पर तैयार करके, उचित घनत्व पर लगाने से इस समस्या से निपटा जा सकता है। ख़ास बात है कि इन सभी स्पर किस्मों का फल अन्य सभी सेमी स्पर और स्टैंडर्ड किस्मों के मुकाबले ज्यादा आकर्षक होता है।

ऊंचाई वाली जगहों (7500 फीट से अधिक) में ओरेगन स्पर 2, ऐस (8000 फीट तक) को ही लगाया जाना चाहिए। इससे अधिक ऊंचाई वाली जगहों पर रॉयल और हेप्का जैसी स्टैंडर्ड किस्मों को ही लगाए, क्युकी इन इलाकों में प्राकृतिक तौर पर ही पौधों की ग्रोथ कम होती है और उनमें अच्छा बीमा भी बनता है। यहां पर फलों में रंगत की भी कोई शिकायत नहीं रहती।

यहां ध्यान देने योग्य है कि बागवानी एवम् वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के फल विशेषज्ञों द्वारा किनाैर और स्पीति जैसी जगहों के लिए जेरोमाइन और रेडविलॉक्स को बेहतर विकल्प सुझाया गया है।