बागवानी में शून्य लागत प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करना कितना सही है ?

बागवानी में शून्य लागत प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करना कितना सही है ?

कृष जानर्था, वित्त सचिव युगा।
इन दिनों हिमाचल के किसान बागवानों में शून्य लागत प्राकृतिक खेती कौतुहल का विषय बना हुआ है। सरकार ने जैविक खेती को बढावा देने के लिए शून्य लागत प्राकृतिक खेती का प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसके प्रचार व प्रसार पर सरकार 25 करोड़ रुपए खर्च करने जा रही है। इसका मकसद राज्य में ज़हर मुक्त फल व सब्जि उत्पादन को बढ़ावा देना और किसान बागवानों की आय व उत्पादन को वर्ष 2022 तक दोगुना करना है। लेकिन मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या बागवानी के क्षेत्र में फलोत्पादन के लिए कोई ऐसी पद्धति भी है? क्योंकि यह कृषि की ऐसी पद्धति है जिसमें बागीचे में पौधा लगाने से लेकर उस पौधे से फल प्राप्त करने तक किसी भी प्रकार की लागत नहीं आती। इस दौरान पौधे को उसकी प्राकृतिक ग्रोथ के अनुसार बढने दिया जाता है और इस दौरान उसमें किसी भी प्रकार का रासायनिक उरर्वक, फफुंदनाशक या कीटनाशक नहीं डाला जाता। बागीचे में बिमारियों की रोकथाम के लिए जैविक प्रबंधन को तरजीह दी जाती है।
यह सुनने में तो अच्छा लगता है, असल में इसे बागवानी के लिहाज़ से ज़मीनीस्तर पर लागू कर पाना उतना ही मुश्किल दिखाई देता है। अधिकतर बागवान पैसे देकर नर्सरी से पौधे प्राप्त करते हैं, क्योंकि स्वयं उच्च गुणवत्तायुक्त पौध तैयार करने के लिए बागीचे के अलावा नर्सरी में अतिरिक्त मेहनत करनी पडती है। इसके अलावा केवल गोबर, गौमूत्र या इनसे बनी खादों या कीटनाशकों के दम पर बागीचों में पोषण संबंधी विकारों और बिमारियों का प्रबंधन संभव नहीं है। अब तक इस प्रकार का कोई शोध नहीं हुआ है जिससे पता चल सके कि इस प्रकार की कृषि पद्धति को फलों की बागवानी में किस प्रकार प्रयोग में लाया जा सकता है।
अगर केवल सेब बागवानी की बात की जाए तो यह इसलिए भी असंभव प्रतीत होता है क्योंकि प्रदेश में लगे सेब व अन्य फलों के बागीचे गंभीर बीमारियों से जुझ रहें है। ऐसी बिमारियां रासायनों के प्रयोग के बाद भी मुश्किल से ही नियंत्रित हो पाती है। इनका जैविक प्रबंधन बेहद मुश्किल है। ऐसी बिमारियां बागीचों में आग की तरह फैलती है और बागवान की साल भर की मेहनत पर पानी फेर जाती है।
सेब के पौधों के पोषण की बात करें तो स्थिति अधिक गंभीर हो जाती है। गोबर या अन्य जैविक खादों से एक औसत आकार के फलदार पेड़ की पोषण संबंधी ज़रूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता। सभी बागवानों के पास गाय होते हुए भी इतना गोबर इकट्ठा नहीं होता कि जिससे बागीचे की साल भर प्रयोग में लाया जा सके। बागवानों को किसी न किसी तरह से बागीचे में निवेश करना ही पडता है। प्रदेश सरकार में कृशि मंत्री डाॅ. रामलाल मारकण्डेय ने जिस तरह पिछले दिनों यह संकेत दिए है कि आगामी चार वर्षोंं में हिमाचल में रासायनिक कीटनाशकों के बेचने पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया जाएगा, उससे प्रतीत होता है कि प्रदेश में बागवानी का कोई भविष्य नहीं रह जाएगा। एक तो बिना किसी शोध के शून्य लागत प्राकृतिक खेती को बागवानी में उतारा जा रहा है। उस पर सरकार का इस तरह का फैसला किसानों की आर्थिकी को दिन ब दिन कमज़ोर करेगा।
यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है कि जिस कृषि पद्धति को लेकर बागवानी के क्षेत्र में कोई शोध और ट्रायल नहीं हुआ है उसे एकदम बागवानों पर किस लिए थोपा जा रहा है? बागवानों को इस कृषि पद्धति के बारे में अधिक जानकारी भी नहीं है। यदि ऐसे में यह पद्धति सही परिणाम न दे सकी तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? यदि इसके कारण बागीचों में अधिक बिमारियां फैलती है तो उस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने क्या ठोस कदम उठाए हैं? क्या सरकार के इस फैसले का समर्थन बागवानी व वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी और कृषि विश्वविद्यालय, पालमपूर द्वारा भी किया जाता है? क्या दोनों विश्वविद्यालयों में इस विषय पर कोई विभाग अलग से शोध कर रहा है ? अगर ऐसा है तो उन्होने अभी तक इस बारे में उनके द्वारा किए गए शोध पत्र प्रकाशित कर बागवानों में क्यों नहीं बांटे ? अगर ऐसा नहीं है तो इस मसले पर उनकी चूप्पी का क्या कारण है ? क्या इस तरह अवैज्ञानिक तरीकों से खेती कर राज्य के किसान बागवानों की आय दोगुनी हो जाएगी ? यह कुछ बातें हैं जिनका जवाब सरकार और बगागवानी विश्वविद्यालय को देना होगा और बागवानों को स्वयं तलाशने होगे। बेहतर होता अगर सरकारी बागिचों में इसके ट्रायल किए जाते और बेहतर परिणाम प्राप्त होने के बाद ही इसे वैज्ञानिक तथ्यों के साथ बागवानों  से सांझा किया जाता। मेरी नज़र में शून्य लागत प्राकृतिक खेती से ज्यादा जरूरत किसान बागवानों को रासायनिक खादो और कीटनाशकों के सही प्रयोग के बारे में जागरूक करने की है। सरकार को इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।