माईकोरिझा एक मित्र फफूंद

मोनू भलूनी, सदस्य यंग एंड यूनाइटेड ग्रोवर्स एसोसिएशन (यूगा)।

माईकोरिझा एक लीविंग फंगस है जो प्लांट वेस्ट पर जिंदा रहता है। दरअसल माईकोरिझा फफूंद पौधे को जमीन में पड़े पोशक तत्‍व (वो तत्‍व जो पौधे की पहुंच से दूर होते है) को मुहैया करवाता है। साथ में पौधे की पानी ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ाता है। जिसके बदले में यह पौधे से उसका वेस्ट फीड करता है। यह इसी पर जीवित रहता है। माईकोरिझा फफूंद की बनावट कुछ इस तरह की होती है कि वो दिखने में सफेद और किसी जड़ की तरह होती है जो पौधे की रूट सिस्टम से लिपटी होती है और दूसरी तरफ पूरी तरह मिट्टी मे चारो तरफ फैली रहती है और बेकार पड़े पोषक तत्‍व की तलाश कर के पौधे को उपलब्ध करवाती रहती है।

मिट्टी में पौधों की जड़ों से लिपटा माइकोरिझा का जाल। 

माईकोरिझा जड़ सड़न की रोकथाम मे भी मदद करता है। होता क्या है जिस प्लांट वेस्ट पर माईकोरिझा जिंदा रहता है उसी प्लांट वेस्ट पर और भी फगस जिंदा रहते है चाहे वो मित्र फफूंद हो या शत्रु फफूंद, क्योंकि सभी जिंदा रहने के लिए प्लांट वेस्ट पर ही निर्भर रहते है। इसी प्रकार जड़ सड़न के लिए ज़िम्मेदार Pythium, Phytophthora को भी उसी फूड की जरूरत होती है। जहाँ माईकोरिझा फंगस होती है, वहां भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा के कारण इस फफूंद की तादाद घटती जाती है और एक वक़्त पर वो अपने आप खत्म हो जाते जिससे आपकी सॉइल सडन मुक्त हो जाती है।

माईकोरिझा के माध्यम से पौधे एक दूसरे से आपसी संवाद भी कर पाते हैं। उदहारण के तौर पर जंगल में जमीन के नीचे माईकोरिझा की काॅलोनी होती है और जड़ों का एक बहतरीन नेटवर्क देखने को मिलता है। इसी वजह से जब किसी पौधे को कोई नुकसान होता है तो उस के आसपास के सभी पौधे उसकी मदद करते है। असल में माईकोरिझा इसमें इनकी मदद करता है। जमीन के नीचे बने (पौधों की जड़ और माईकोरिझा) नेटवर्क (टेलिफोन नेटवर्क की तरह) के माध्यम से रोग ग्रसित पौधे को सभी जरूरी पोषक तत्‍व मुहैया करवाते है जिससे उस पौधे को रिकवरी में असानी होती है।

माईकोरिझा को पौधारोपण के समय, मॉनसून की शुरुआती बारिशों के दौरान जब मिट्टी में पर्याप्त नमी हो, और पोस्ट हार्वेस्ट के समय प्रयोग किया जा सकता है। माईकोरिझा को प्रयोग करने से पहले इसे एक किलो प्रति क्विंटल की दर से सड़े हुए गोबर में मिला दें और कुछ दिनों तक किसी प्लास्टिक के तिरपाल के अंदर अच्छे से बांध कर किसी ऐसी जगह पर रखें जहां पर तापमान में लगभग स्थिरता बनी रहे। ऐसा करने के लगभग बीस दिनों बाद माईकोरिझा युक्त खाद को पौधे के आकार के हिसाब से एक से दो किलो प्रति पेड़ की दर से मिला लें। ध्यान रहे कि इस दौरान कुछ समय तक रासायनिक खादो का प्रयोग न करें ताकि इस मित्र फफूंद की जनसंख्या पर इसके कारण प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

आज से 30-40 साल पहले तक ये चीज़ें हमारे बगीचों में भी हुआ करती थी किन्तु अब रासायनिक खादो के अत्यधिक प्रयोग की वजह से मिट्टी में ऐसे मित्र फफूंदों की तादात घट रही है और यह फफूंद हमे खरीद कर प्रयोग करनी पड़ रही है।