सही प्रुनिंग तकनीक है बेहतर फसल का आधार

अनीश अम्राईक, सदस्य यंग एंड युनाइटेड ग्रोवर्स एसोसिएशन (युगा)।

प्रदेश के ज्यादात्तर बागवान अभी भी प्रूनिंग को ज्यादा महत्व नहीं देते हैं। उनके लिए यह काम रूटीन की तरह हो गया है। हर साल पतझड़ के बाद पौधों की कांट छांट कर जल्दी से इस काम को निपटाना है और अगला काम शुरू करना है। जबकि प्रूनिंग सिस्टम पर ही बेहतर फसल, पौधे का सही विकास और बेहतर फ्रूट क्वालिटी जैसी चीजे निर्भर करती है। ऐसे में प्रूनिंग के काम को हल्के में न लेकर इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

प्रूनिंग के बारे में चर्चा करने से पहले हम बात करेंगे कि प्रूनिंग का सही समय क्या है। वैसे तो सेब व अन्य फलों में प्रुनिंग के लिये लेट विंटर यानि जनवरी का आखरी सप्ताह और फरवरी महीना सही समय माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि फरवरी के बाद पौधे सुप्तवस्था से बाहर निकलते है और उनमें रस संचार (सैप फ्लो) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। ऐसे में प्रूनिंग के दौरान पौधों को लगने वाले घाव जल्दी भर जाते है। जबकि जल्दी प्रूनिंग करने से पौधों के घाव ज्यादा देर तक खुले रहते हैं। जिससे कैंकर जैसी बीमारियां पौधों में लग जाती है। ऐसे में लेट विंटर ही प्रूनिंग के लिए सही समय माना जाता है। लेकिन अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में जहां सार्दियों में अधिक हिमपात के कारण पौंधों को क्षति पहुँचती है वहां पौंधों में सुप्तावस्था (dormancy) शुरू होते ही कांट छांट का कार्य आरम्भ कर सकते है।

प्रुनिंग के बारे में अधिक विस्तृत बात की जाए तो यह प्रक्रिया पौंधों को सही आकार व क्वालिटी फ्रूट्स प्राप्त करने के लिये अमल में लाई जाती है। प्रुनिंग करने का मुख्य उद्देश्य पौंधों की मृत, बिमारीयों से ग्रसित व अवांछित शाखाओं को हटाना होता है ताकि पौंधे को स्वस्थ रखा जा सके। इस प्रक्रिया में पौंधे के भीतरी भाग में अंदर की तरफ उगने वाली टहनियों को काटा जाता है ताकि सीज़न की नयी ग्रोथ को इच्छानुसार रोक कर हवा व धूप के पौधे के भीतरी भाग तक प्रवेश को सम्भव किया जा सके। धूप व हवा के निरंतर प्रसार के लिये ओपन कनॉपि होना बेहद जरूरी है इसके कारण बेहतर क्वालिटी का फल उत्पादन सम्भव होता है। इसके अलावा फल देने वाली तीन से पांच साल पुरानी छोटी टहनियों की छंटाई की जाती है। पुराने बीमो की छँटाई करके नये बीमो को उचित दूरी पर रखना चाहिये जिससे फल लगने की स्थिति में बेहतर आकार का क्वालिटी फ्रूट प्राप्त किया जा सके। बीमे की छंटाई करते समय फ्रूट बड और वेजिटेटिव बड में फर्क समझना जरूरी है । गहरे रंग का सिकुड़ा हुआ बीमा फ्रूट बड होता है। वेजिटेटिव बड भी फ्रूट बड जैसा ही होता है मगर उसमें सिकुड़न और गहरा रंग नहीं होता।

इसके अलावा एक फलदार पौधे में एक सेंट्रल लीडर होना जरूरी है। दो अथवा अधिक लीडर होने पर पौधा कमजोर हो जाता है। लम्बी और मजबूत टहनी का चयन लीडर के तौर पर किया जाना चाहिये और कमजोर टहनी को हटा देना चाहिये।

फोटो में यह दिखाया गया है कि मुख्य तने के साथ कुछ अन्य टहनियों को रखने के कारण मुख्य तना कमज़ोर पड़ जाता है और पेड़ कुछ इस प्रकार दिखाई देता है।

प्रुनिंग करते समय ध्यान देना चाहिये कि पौधे की जो टहनियां आपस में क्रॉस कर रही हो उन्हें हटा दिया जाए क्योंकि इसके कारण धूप के पौंधे के भीतरी भागों तक पहुँचने में बाधा उत्पन्न होती है। ऐसा करते समय याद रखें कि पौधे पर बड़े घाव ना बने। ऐसा होने पर घाव भरने में काफी समय लग जाता है और केंकर होने की सम्भावनायें बढ़ जाती है।

पौधे की जिस हिस्से में टेहनियो के बीच आधिक खाली जगह हो वहां नोचिंग करके नयी टहनी तैयार की जाती है। इस विधि में बड (कली) के ऊपर छोटा सा छेद या घाव बनाया जाता है जिससे बड के पास नयी टहनी निकलती है।

हमारे सेब के बागीचे अधिकतर पुराने हो चुके है, फिर भी उनमें ग्रोथ ज्यादा है और बीमा बनने की प्रक्रिया धीमी है। ऐसा गलत प्रुनिंग प्रैक्टिस की वजह से हो रहा है। हमे उच्च गुणवत्ता युक्त पैदावार और स्वस्थ पौधे के लिए उसकी ग्रोथ और बीमा बनने की प्रक्रिया को संतुलित करना होता है। इसके लिए नई ग्रोथ वाली टहनियों को एक चौथाई काट दिया जाता है।

नई ग्रोथ में अलग अलग ऊंचाई पर हेड बैक करने के परिणाम अलगे वर्ष कुछ इस प्रकार नज़र आते हैं।

जिन पौधों में अधिक ग्रोथ होती है उनकी ग्रोथ को रोककर बीमा बनाने में परिवर्तित किया जाना चाहिए। इसके लिए या तो ग्रोथ को कमजोर टहनी में डाले या हैडबैक ही न किया जाए। ऐसा करने से भी पौधों की ग्रोथ रुक जाती है और पुरानी टहनियों में बीमा बनना शुरू हो जाता है।

सेब के पौंधे की कांट छांट सार्दियों में प्रत्येक वर्ष की जानी चाहिये। अगर शुरुवाती वर्षौं में सही कांट छांट ना की जाए तो इसका परिणाम वैकल्पिक फसल के रूप में भुगतने को मिल सकता है। अर्थात ऑन एंड ऑफ ईयर प्रोडक्शन। आमतौर पर देखा गया है कि हम सभी उम्र के पौधों की कांट छांट एक ही तरह से करते हैं। यह बिल्कुल सही नहीं है। पौधे की कांट छांट उसकी उम्र, कैनोपी, ग्रोथ और बीमा बनने की प्रक्रिया को ध्यान में रखकर की जाती है। स्मरण रहे एक ही पौधे में दो तरह से प्रूनिग होनी चाहिए। क्युकी पौधे के उपरी भाग में ग्रोथ ऊपर की ओर उठी हुई और अधिक होती है तो वहां पर बीमा बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। पौधे के उपरी भाग की कांट छांट ऐसे होनी चाहिए कि अधिक से अधिक धूप पौधे के निचले हिस्से तक पहुंच पाए।

शुरुवाती वर्षों में पौधों की कैनोपी को दिए गए चित्रानुसार बनाया जाना चाहिए।

इन सब बातों के अलावा सबसे ज्यादा अहम बात है प्रुनिंग टूल्स को स्टेरलाइज करना । इसके लिये अल्कोहल को प्रयोग में लाया जा सकता है या आग की लौ पर कुछ देर तक कैंची की नोक को गर्म करने से भी टूल स्टेरलाइज किया जा सकता है।

वायरस ग्रसित पौंधों को चिन्हित कर उनमें सबसे बाद में कांट छांट का काम किया जाना चाहिये। इन्फेक्टेड शाखाओं को प्लास्टिक के थैले में बंद करके बागीचे से दूर ले जाकर किसी गड्ढे में जला देना चाहिये। प्रुनिंग कार्य खत्म होते ही सबसे पहले बड़े घावों पर पेस्ट लगाना चाहिये ताकि घाव पानी व बाहरी वातावरण से सुरक्षित रह सके। इसके कारण टहनी सड़ने व केंकर जैसी खतरनाक बीमरियों से पौधे का बचाव होता है।

सेब व अन्य फलों के पौधों में प्रुनिंग का विशेष महत्व है। इसलिए कांट छांट का कार्य ऐसे व्यक्ति से कारवाना चाहिये जो इस कार्य में दक्ष हो, क्योंकि सही प्रुनिंग तकनीक ही है बेहतर फसल का आधार।