“GAP“ से बदलेगी बागवानी की तस्वीर

“GAP“ से बदलेगी बागवानी की तस्वीर

प्रशान्त प्रताप सेहटा, सदस्य यंग एंड युनाईटेड ग्रोवर्स एस्सोसिएशन (युगा)।
हिमाचल प्रदेश के मध्यवर्ती और ऊपरी इलाकों के लोगों की आर्थिकी फलोत्पादन पर टिकी है। सेब बागवानी इसका मुख्य आधार है और इसने प्रदेश में अपने अस्तित्व के सौ साल भी पूरे कर लिए हैं। लेकिन पहाड़ी लोगों की कमाई का यह जरिया एक अति महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। सेब की पुरानी किस्मों की जगह नई स्पर किस्मों ने ले ली है। बागवान बागीचों के प्रबंधन सुधार की तरफ ध्यान दे रहे हैं और आधुनिक तकनीको के दौर में इंटरनेट की मदद से फलोत्पादन की सभी बारीकियां सीख रहे हैं। सरल शब्दों में लिखूं तो सेब बागवान इसे एक व्यावसाय और रोजगार के माध्यम के रूप में अपना रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में बागवानों के मध्य रासायनिक और जैविक तरीकों से उत्पादन करने की होड़ लगी है। लेकिन दोनों ही तरीकों में बागवान पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रहे हैं।
मैं जब भी अपने पिताजी के साथ बागीचे में समय गुज़ारता हूं, वह हमेशा कहते हैं कि “अब बागवानी पहले जैसी नहीं रही। उत्पादन के साथ साथ बागीचो में बिमारियों और कीटों का प्रकोप भी बढ़ गया है जिससे प्रबंधन का कार्य भी कठिन हो गया है।“ यह बात बिल्कुल सही है। रसायनों के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि तो हुई है साथ ही बागीचों में कई तरह की बिमारियों ने भी घर कर लिया है। ऐसे में यदि हम जैविक उत्पादन की तरफ रूख करें तो उत्पादन घटने का खतरा बना रहता है। साथ ही अपर्याप्त संसाधनो के चलते शायद यह प्रैक्टिस संभव भी न हो।
हाल ही के वर्षों में तेज़ बदलाव और वैश्वीकरण के दौर से गुज़र रही खाद्य अर्थव्यवस्था में खाद्य उत्पादन, सुरक्षा और गुणवत्ता को आधार मानकर “गुड एग्रीकल्चरल प्रैक्टिसेज़ (GAP)“ की अवधारणा को विकसित किया गया है जिसे संयुक्त राष्ट्र की “फूड एंड एग्रीकल्चर आॅर्गेनाइज़ेशन (FAO)“ ने मान्यता प्रदान की है। यह कृषि विज्ञान की एक ऐसी क्रिया है जिसमें आर्थिक और खाद्य सुरक्षा के साथ साथ पर्यावरणीय और सामाजिक स्थिरता को भी महत्ता दी जाती है।
बीते कुछ वर्षोंं तक मैंने भी अपने बागीचे से जैविक उत्पादन प्राप्त करने की कोशिश की। किन्तु इस प्रकिया में पांच वर्षोंं में उत्पादन घटकर लगभग आधा हो गया और उत्पादन लागत दो से तीन गुणा बढ़ गई। ऐसी परिस्थितियों में हमने बागीचे का प्रबंधन “GAP“ अपनाकर शुरू कर दिया। पहले वर्ष ही उत्पादन में वृद्धि होना शुरू हो गया और इस वर्ष तक दोबारा उत्पादन की लागत भी एक चैथाई तक कम हो गई। फलों की गुणवत्ता में भी वद्धि हो रही है। हम साल दर साल इसमें आवश्यक संशोधन कर इसे विस्तृत रूप से अपनाने का प्रयास कर रहे हैं।
“GAP“ एक सरल प्रक्रिया है जिसमें बागीचे का प्रबंधन जैविक व रासायनिक दोंनों तरीकों से किया जाता है। इस क्रिया में जैविक प्रबंधन को अधिक तरजीह दी जाती है। इसमें मिट्टी की उर्वरकता बनाए रखने के लिए विशेष ध्यान दिया जाता है और अधिकतर समय जैविक उर्वरक ही इस्तेमाल किए जाते हैं। रासायनिक खादों का इस्तेमाल मृदा परीक्षण के बाद सुक्ष्म पोषक तत्वों की कमी पाए जाने पर ही किया जाता है। ऐसे में किसी भी प्रकार की मिक्सड और अधिक अवशेष छोड़ने वाले फर्टीलाइज़र को प्रयोग नहीं किया जाता।
बिमारियो के प्रबंधन के लिए भी जैविक प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाती है। कीटों की रोकथाम के लिए मित्र कीटों की मदद ली जाती है। इसके लिए बागीचों में मित्र कीटों की पर्याप्त संख्या को सुनिश्चित करना और उनकी सुरक्षा को बेहद अहम माना गया है। बैक्टीरिया और फफूंदजनित रोगों की रोगथाम के लिए आॅचर्ड सैनीटेशन, फ़्लोर मैनेजमैंट और बागीचे के प्रबंधन से जुडे अन्य सभी कार्यों को तकनीकी तौर पर सहीं ढंग से करने का सुझाव दिया जाता है। इस प्रक्रिया में प्रबंधन में आने वाली सभी प्रकार की समस्याओं के निदान के लिए पहले से ही तैयारियां की जाती है जिससे समय रहते उपचार किया जा सके। यह एक विस्तृत प्रक्रिया है जिसमें रिस्क असेसमेंट, फील्ड एंड इक्विपमेंट सेनीटेशन, इंटीग्रेटिड पैस्ट मैंनेजमेंट (IPM) जैसे विषयों से संबंधित जानकारी होना ज़रूरी है।
यह सच है कि कृषि और बागवानी का भविष्य इसी क्रिया पर निर्भर करता है। लेकिन यह प्रक्रिया जितनी सरल प्रतीत हो रही है उतनी है नहीं। इसके लिए बागवानों, खासकर आर्थिक तौर पर छोटे और मध्यमवर्गीय बागवानों में जानकारी का होना सबसे अधिक आवश्यक है। जैविक प्रबंधन के लिए मित्र कीटों की वंश वृद्धि को सुनिश्चित करना और कृषि के लिए प्रयोग आने वाले “GAP“ सर्टीफाईड उत्पादों को प्राप्त करना कठिन कार्य है। विदेशों से ऐसे उत्पाद प्राप्त करने की स्थिति में उत्पादन लागत में इज़ाफ़ा हो सकता है। इसके अलावा विशेष रूप से “GAP“ सर्टीफ़ाईड उत्पाद के लिए प्रमाण पत्र हासिल करना भी चूनौतीयों भरा हो सकता है जिसके कारण कई लोगों का इससे मोह भंग हो सकता है। वैश्वीकरण के दौर में एक ओर हमें उत्पादन बढ़ाना है वहीं दूसरी तरफ़ सामाजिक स्वीकार्यता, आर्थिक और पर्यावरणीय स्थिरता के साथ उत्पादन में उच्च गुणवत्ता को सुनिश्चित करने का दबाव भी है। जोकि पूर्ण रूप से रासायनिक या जैविक खेती द्वारा संभव नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में सरकार व प्रशासन को इस संदर्भ में पहल कर बागवानों की मदद के लिए आगे आना चाहिए। तभी हम वैश्विक बाज़ार मे चल रहीं खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा की दौड़ में अपनी जगह बना पाएंगे।